हम अक्सर जिंदगी में उन चीजों को हासिल करने के लिए दिन-रात दौड़ रहे हैं, जिन्हें हम मरने के बाद साथ नहीं ले जा सकते। इस अंधी दौड़ में हम बाहर से तो बहुत अमीर या कामयाब दिखते हैं, लेकिन अंदर से उतने ही अकेले और बेचैन होते हैं। गुरु नानक देव जी ने इस मानवीय स्वभाव को एक बेहद सरल और गहरे सत्य से समझाया है:“मनुख बिनु बूझे बिरथा आया।कचहु कंचनु कहु की कीआ, निहचलु कछु न पाइआ।” — श्री गुरु ग्रंथ साहिब (गुरु नानक देव) इस वाणी को पढ़कर लोग अक्सर यह गलत मतलब निकाल लेते हैं कि गुरु