40. चमड़ी का मोहजिसे तुम प्रेम कहते हो, वह बस एक बीमारी है,खाल के रंग-रूप पर, ये कैसी दीवानगी भारी है!जिसे देखकर पिघल रहे, वो पिंजर मांस का ढांचा है,अहंकार ने अपने ही मन में, यह कैसा खेल रचा है?चमड़ी आज जो कसी हुई, कल ढीली पड़ जाएगी,यह मिट्टी की पुतली आखिर, मिट्टी में मिल जाएगी।जो बदल रहा प्रतिपल-छिन, उससे कैसा नाता जोड़ रहे?सच्चे अमृत को छोड़कर तुम, क्यों विष की नदियां मोड़ रहे?आकर्षण तो बस प्रकृति का, एक छोटा सा षड्यंत्र है,जीव को जीव से बांधने का, यह मायावी मन्त्र है।तुम फंसे रहे बस अंगों में, और समझ बैठे