“अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।दास मलूका कहि गए, सब के दाता राम॥” — संत मलूक दासअक्सर लोग इस दोहे को सतही तौर पर पढ़कर बहुत बड़ी गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं। वे सोचते हैं कि मलूक दास जी हमें आलसी बनने, कामधंधा छोड़ने या भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर बैठने की सलाह दे रहे हैं। लोग सोचते हैं कि “अगर भगवान को ही सब देना है, तो हम मेहनत क्यों करें?” लेकिन असल में यह दोहा आलस का नहीं, बल्कि मानसिक तनाव से मुक्ति और ब्रह्मांड की व्यवस्था पर ‘परम विश्वास’ का सबसे बड़ा