वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानीचौड़ी सड़क पर शाम उतर रही थी। दिन भर की तपिश से सड़क अब भी भट्टी की तरह तप रही थी। शेखर ने अपनी कार डोमिनोज़ के सामने पार्क की ओर अंदर चला गया। जब वह लौटा, तो सड़क पर तमाशा शुरू हो चुका था-बिना टिकट का, बिना मंच का, बिना तालियों का। शेखर कार में बैठा-बैठा इस अद्भुत तमाशे को देखने लगा।सात-आठ साल का एक लड़का था, बदन पर कपड़े कम, धूल और मेहनत का रंग ज़्यादा। उसने दोनों हाथ हवा में उठाए, फिर हथेलियां सड़क पर टिकाईं और एक झटके में गुलाटी मारी। अपनी