एक बूंद बादलों की गोद में बैठी सोच रही थी। नीचे कितनी गर्मी है, अगर मैं बाहर गई तो गर्मी में भाप बन जाऊंगी। मनुष्य कितना स्वार्थी हो गया है। जंगल काटकर शहर बसाए जा रहा है। ओजोन लेयर का छेद बढ़ता जा रहा है। हे मूर्ख मनुष्य! देख धरती तप रही है। प्रशांत महासागर का पानी उबल रहा है। बड़े पेड़ ही तो मिट्टी का कटाव रोकते हैं, बादलों को खींचते हैं, मैं अकेली बूंद तो खुद भाप बन उड़ जाऊंगी, बारिश को तरस जाओगे, फसलें कैसे उगाओगे, अन्न नहीं होगा तो क्या खाओगे। अब भी वक्त है सुधर जाओ,