धर्मराज की सभाप्रथम अध्याय : यमलोक की आपातकालीन सभापृथ्वी पर पाप, भ्रष्टाचार, छल, कपट और अन्याय का ऐसा अंधकार फैल चुका था कि धर्म का संतुलन डगमगाने लगा था। मनुष्य अपनी बुद्धि और चतुराई के बल पर कानूनों को भी धोखा देने लगा था। धन, पद और स्वार्थ ने सत्य, करुणा और ईमानदारी को पीछे छोड़ दिया था। धर्म का वास्तविक स्वरूप धीरे-धीरे कर्मकाण्ड तक सीमित होता जा रहा था।इन परिस्थितियों को देखकर धर्मराज यम गहरे चिंतन में डूब गए। युगों से न्याय करने वाले धर्मराज ने ऐसा समय पहले कभी नहीं देखा था। अंततः उन्होंने यमलोक में एक आपातकालीन