“रहिमन ओछे नरन सो, बैर भलो न प्रीति।काटे चाटे स्वान के, दुहूँ भाँति विपरीत।।”रहीम जी का यह कालजयी दोहा हमें समाज में जीने, इंसानी स्वभाव को पहचानने और व्यावहारिक जीवन (Social Wisdom) को कुशलता से चलाने का अचूक मंत्र देता है।रहीम जी स्पष्ट रूप से समझाते हैं कि जो लोग ओछे (संकीर्ण मानसिकता वाले), नकारात्मक, स्वार्थी या दुर्जन स्वभाव के होते हैं, उनसे न तो दुश्मनी (बैर) अच्छी होती है और न ही बहुत ज़्यादा गहरी दोस्ती (प्रीति)। ऐसे लोगों से हमेशा एक गरिमामय और मर्यादित दूरी (Healthy Boundary) बनाकर रखनी चाहिए, क्योंकि आप उनसे चाहे जैसा रिश्ता रखें, अंत