आक्रोश का नंगा नाच और रूहानी कत्लेआमभाग एक: आँखों में उतरता खूनइकबाल की आँखें अब सफेद नहीं, बल्कि स्याही की तरह नीली और खून की तरह सुर्ख हो चुकी हैं. वह हाथ- गाडी के हैंडल को इतनी जोर से भींचता है कि लोहे से चरमराने की आवाज आती है. वह मुंबई की उन गलियों से गुजर रहा है जहाँ उसने कभी अपनी इज्जत नीलाम होते देखी थी. उसके दिमाग में सिर्फ एक ही धुन बज रही है—बदला. वह बदला जो जुबेदा के घर की दिवारों को गिरा देगा. वह चिल्लाता नहीं है, उसकी खामोशी में हजारों चीखें दफन हैं. आज