स्वयंवधू - 67

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67. हमारा इतिहास भाग 2(अभी …हाह… क्यों? …अभी क्यों?…)महाशक्ति डर से अपनी साँस खोते हुए रही थी।कवच हिचक में मुट्ठी बाँध खड़ा था।उसके पास सोचने का वक्त नहीं था।उसे बस एक्शन लेना था।(इसका रास्ता है सच्चाई। सच बोल दो कवच।)मेरी आकाशवाणी कवच के कानों से होते हुए उसके नस-नस में घुस गई।अपनी हिचक की मुट्ठी छोड़,"मैंने तुम्हें कभी काम की नज़रों से नहीं देखा वृषाली।"कवच ने धीमी पर दृढ़ स्वर से बोला।महाशक्ति ने उसे कठिनाई से साँस लेते हुए देखा।मेरा यही काम है, अपने भूले-भटके शक्तियों को लाइन पे लाना।वो धीमे-धीमे अपनी शक्ति की तरफ सच्चे दिल से चल रहा