अमृत वाणी - संत वाणी - 4

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“जे का रंजले गांजले। त्यासी म्हणे जो आपुले।तोचि साधु ओळखावा। देव तेथेचि जाणावा।।”संत तुकाराम जी महाराज का यह अभंग बहुत ही सीधा, सरल और मन को छू लेने वाला है। वे यहाँ समझा रहे हैं कि जो व्यक्ति इस संसार के दुखी, गरीब और असहाय लोगों को अपना समझकर गले लगाता है, वही वास्तव में सच्चा संत है और ईश्वर साक्षात वहीं निवास करते हैं।संत तुकाराम जी स्वयं भगवान विट्ठल के बहुत बड़े भक्त थे। वे इस अभंग के माध्यम से हमें भक्ति का एक बहुत ही व्यावहारिक रूप दिखा रहे हैं।व्यावहारिक उदाहरणइसे हम एक बहुत ही सीधे उदाहरण से