अमृत वाणी - संत वाणी - 3

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संत तुलसीदास जी की यह अमर चौपाई जीवन में सबसे बड़ा पुण्य और सबसे बड़ा पाप क्या है, इसे बहुत ही सीधे और तार्किक तरीके से समझाती है। इसे बिना किसी भ्रम और सटीक उदाहरण के साथ नीचे तैयार किया गया है:“पर हित सरिस धरम नहिं भाई।पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।”अक्सर लोग पुण्य कमाने के लिए कठिन व्रत, अनुष्ठान या दूर-दूर की यात्राएं करते हैं। लेकिन तुलसीदास जी ने इस चौपाई में पुण्य की एक बेहद सरल और व्यावहारिक परिभाषा दी है, जिसे हर आम इंसान अपने दैनिक जीवन में अपना सकता है।गहरे अर्थ की व्याख्यातुलसीदास जी कहते हैं कि