चलो दूर कहीं.. 23सुबह की औरा ने रोहन के व्याकुल मन को कुछ देर के लिए सुकून पहुंचाया था। भोर के सुनी सड़क पर तेज गति से दौड़ते गाड़ी से ज्यादा स्पीड से उसके मन मस्तिष्क में विचारों की श्रृंखलाएं दौड़ रही थी। दोस्त होने के नाते प्रतीक्षा की सहायता करना उसका फर्ज था लेकिन उसके लिए सिरदर्द के सबब बने हुए थे उसके दोस्त और उसमें भी खासकर अनाह.. उसे न जाने उससे क्यों चिढ़ हो रही थी? अगर इन्हें अपने घर ले गया तो लोग तरह तरह के प्रश्न करेंगे..? क्या करुं कुछ समझ नहीं आता..? प्रतीक्षा से