“माटी कहै कुम्हार सों, तू क्या रौंदे मोहि।इक दिन ऐसा होयगा, मैं रौंदूगी तोहि।।”संत कबीर जी के इस दोहे को अक्सर लोग गलत समझ लेते हैं। वे सोचते हैं कि कबीर जी हमें डरा रहे हैं या जीवन से निराश कर रहे हैं कि “जब अंत में मिट्टी ही होना है, तो मेहनत क्यों करें?” लेकिन असल में यह निराशा की नहीं, बल्कि जीवन को सही ढंग से जीने की सबसे बड़ी प्रेरणा है।गहरे अर्थ की व्याख्यायहाँ मिट्टी और कुम्हार के माध्यम से समय के चक्र को समझाया गया है। कुम्हार मिट्टी को अपने पैरों से कुचलता है ताकि वह