कमरे में फैली सन्नाटे की चादर को सिर्फ बाहर के तूफान का शोर चीर रहा था। इंस्पेक्टर समीर ने मेज पर अपनी पिस्तौल रख दी थी। उनकी नजर दीवान साहब की पथराई आंखों से हटकर फिर से उस 'काली रानी' पर टिक गई, जो खून से सनी थी।"दरवाजा अंदर से बंद था... खिड़कियों पर लोहे की मजबूत जालियां हैं," समीर मन ही मन बुदबुदाए, "तो फिर कातिल हवा में गायब हो गया?""मैंने कहा था न साहब!" केयरटेकर शर्मा जी कांपती आवाज में बोले, "यह किसी इंसान का काम नहीं है। वह तिजोरी... वह तिजोरी कोई मामूली लोहे का डिब्बा नहीं