(रात का सन्नाटा... हवाओं में ठंडक है।आसमान काला, बिजली की चमक रह-रहकर चारों ओर फैल रही है।करण के घर के दरवाज़े पर दस्तक होती है — “ठक... ठक...”)(करण दरवाज़ा खोलता है — सामने सिमरन खड़ी है, भीगी हुई, थकी हुई, पर आँखों में वही सच्चाई।)करण (गुस्से में) बोला - “तुम...? तुम यहाँ क्या कर रही हो?”(सिमरन काँपती हुई आवाज़ में जवाब देती है —)सिमरन बोली - “करण की... मैं यहीं रहना चाहती हूँ...मैं आपकी पत्नी हूँ...”(करण की भौंहें तन जाती हैं। वो एक ठंडी, कटीली हँसी हँसता है।)करण बोला - “पत्नी...?मैने किसी से शादी की , ये तो मुझे याद ही नहीं...मुझे तो