जय महाकाल मैं मानती हूँ कि कविता का धर्म सिर्फ सौंदर्य रचना नहीं है। उसका काम है दीवार पर उँगली रखकर पूछना - "यहाँ दरार क्यों है?" उसका काम है उस अँधेरे को नाम देना जिससे हम सब आँख चुराते हैं।यदि इस संग्रह को पढ़ते हुए आपको लगे कि ये पंक्तियाँ आपकी भी हैं, तो समझिएगा कि कविता अपने लक्ष्य तक पहुँच गई। क्योंकि अंततः कविता ‘मेरी’ नहीं रहती, ‘हमारी’ हो जाती है।कविता समय का सबसे ईमानदार दस्तावेज़ होती है। वह सत्ता से नहीं डरती, बाज़ार से सौदा नहीं करती। वह बस उस क्षण को दर्ज करती है जब मनुष्य सबसे