चलो दूर कहीं.. 21 रात के लगभग ग्यारह बजे थे। भोपाल–दिल्ली हाईवे अंधेरे के विशाल समुद्र में एक चमकती हुई रेखा जैसा दिखाई दे रहा था। दूर-दूर तक फैली काली सड़क पर ट्रकों की हेडलाइटें जुगनुओं की कतार की तरह टिमटिमा रही थीं। कहीं-कहीं ढाबों की पीली रोशनी सन्नाटे को चीरती हुई यात्रियों को अपनी ओर बुला रही थी। सड़क के दोनों ओर खेत और पेड़ों की परछाइयाँ अंधेरे में गुम थीं, मानो किसी रहस्य को छिपाए खड़ी हों। हवा में डीजल, मिट्टी और रात की ठंडक का मिला-जुला एहसास था। कभी किसी तेज रफ्तार बस का हॉर्न सन्नाटे को तोड़