(मंदिर के बाहर सुबह की हल्की किरणें फैल रही हैं।रात का अँधेरा धीरे-धीरे मिट चुका है। करण मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा है, सिमरन उसकी गोद में शांत पड़ी हुई है।करण की आँखों में अब भी आँसू हैं, पर उनमें एक उम्मीद की चमक है।)(अचानक सिमरन की उँगलियाँ हिलती हैं।उसकी साँसें गहरी होती हैं, और वो धीरे-धीरे आँखें खोलती है।)सिमरन (धीरे, मासूम आवाज़ में) बोली - “... क करण जी?...”(करण चौक उठता है। उसकी आँखों से आँसू बह पड़ते हैं।वो सिमरन को गले से कसकर लगा लेता है।)करण (टूटे, पर खुश स्वर में) बोला - “सिमरन!... तुम... तुम ज़िंदा हो!... भगवान ने मेरी