बारह बरश का इंतज़ार - 2

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कमरे में सिर पकड़े बैठी कुसुम के ज़ेहन में ! बारह बरस पहले की यादों ने हल्के से दस्तक दी ! और कुसुम उन्हें आने से रोक नहीं पाई।बचपन मैं जब वो पाँच साल की थी, तब वो इस शहर में अपने माँ-पापा के साथ आई थी।वो कभी भी आसानी से दोस्त नहीं बना पाती थी।यही कारण था कि यहाँ आने के बाद भी दो दिन तक वो अपने घर से बाहर नहीं निकली थी।हमेशा की तरह वो अपने कमरे में बैठी अपनी गुड़िया के बालों को सँवार रही थी,जब एक “ चहकती सी आवाज़ “ उसको सुनाई दी “हैलो! “ कुसुम ने