शब्द और सत्य - भाग 11

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31.आभासी कैदहाथ में पकड़े हो जो यंत्र,क्या वह सचमुच तुम्हारा मित्र है?या तुम्हारी ही स्वतंत्रता को निगलने का,बनाया गया कोई सूक्ष्म चित्र है?दौड़ते हो जिसे छूने को बार-बार,वह बस एक रंगीन पर्दा है।सत्य से भागने का, स्वयं को सुलाने का,यह एक आधुनिक धंधा है।लाइक और कमेंट्स की इस अंधी दौड़ में,तुमने खुद का मूल्य कितना गिराया है?जो भीतर देखना था, जो मौन जानना था,उसे रील्स के शोर में गंवाया है।रिश्ते अब केवल स्क्रीन पर जीवित हैं,सामने बैठा मित्र भी अब पराया है।तुम जीवित मनुष्य नहीं रहे अब,मशीन ने तुमको अपना गुलाम बनाया है।जागो! इस आभासी सम्मोहन को तोड़ो,यह मोबाइल तुम्हारी