तीन दिन हो चुके थे। तीनों एक ही घर में थे, एक ही छत के नीचे, पर दिलों के बीच की दूरी किसी खाई से कम नहीं थी।कबीर और करण आमने-सामने आते तो औपचारिक-सी बातचीत करते,ज़रूरत भर के शब्द, बिना आँखों में देखे। दोनों जानते थे कि दर्द दोनों के पास है, पर कोई भी पहले हाथ बढ़ाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।घर में अजीब-सी खामोशी रहती।कभी-कभी ऐसा लगता, जैसे दीवारें भी साँस रोककर सुन रही हों। वहीं श्रेया यह सब देख रही थी। उसका दिल सबसे ज़्यादा टूट रहा था।उसे साफ़ दिखता था करण उसके सामने होते