शिवपुर।एक ऐसा शहर…जहाँ रातें गोलियों की आवाज़ से शुरू होती थीं और लाशों पर खत्म।यहाँ लोग नाम से नहीं, गिरोह से पहचाने जाते थे।कानून सिर्फ दीवारों पर टंगे पोस्टरों में जिंदा था।असल सत्ता उन लोगों के हाथ में थी जिनके पास बंदूक, पैसा और डर था।और उन सबमें सबसे बड़ा नाम था — राजू भाई।आजम बाज़ार उसका इलाका था।वहाँ बिना उसकी मर्जी के पत्ता तक नहीं हिलता था।शाम के करीब सात बजे।पूरा आजम बाज़ार रोशनी से जगमगा रहा था।दुकानदार ग्राहकों को बुला रहे थे…ठेलों से उठती मसालों की खुशबू हवा में फैली हुई थी।तभी दूर से एक सफेद स्कॉर्पियो बाज़ार