बुझता दीपक (एक मार्मिक कथा)कोयले की धूल और लाल मिट्टी से घिरे छोटे-से गाँव में झींगुर और जगा की दोस्ती मिसाल मानी जाती थी।लोग कहते—“एक लँगड़ा है, दूसरा आलसी…फिर भी दोनों की जोड़ी राम-लखन जैसी ।”दोनों सुबह साथ नदी जाते,साथ हाट में सब्जियाँ बेचतेऔर शाम को किसी पेड़ के नीचे बैठकर हुक्का गुड़गुड़ाते।जगा बचपन से लँगड़ा था।चलते समय उसका दायाँ पैर घिसटता था।वह तेज काम नहीं कर सकता था,पर मन का बहुत साफ था।और झींगुर…वह ताकतवर था, मेहनत भी कर सकता था,लेकिन उसकी एक आदत उसे भीतर से खोखला कर रही थी—काम टालना।आज नहीं तो कल।कल नहीं तो परसों।धीरे-धीरे