सुबह घर की पुरानी पुस्तकों के बीच एक छोटी-सी, मात्र बासठ पन्नों की पुस्तिका हाथ लगी—सत्यवादी हरिश्चंद्र। उसे देखते ही बचपन की अनेक स्मृतियाँ जाग उठीं। कॉलेज जाने की जल्दी थी, इसलिए उसे हाथ में लेकर ही निकल पड़ा। रास्ते में डोरंडा से मित्र चंदन मिल गए। उनकी गाड़ी पर पीछे बैठकर मैंने पढ़ना शुरू किया। सड़क आगे बढ़ रही थी, पर मन उस कथा के भीतर उतरता जा रहा था।पन्ने पलटते-पलटते अचानक एक पात्र मेरे हृदय में उतरने लगा—रोहताश। अब तक मैंने हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा और तारामती के त्याग के बारे में बहुत सुना था, पर इस बार रोहताश