भाग -1 || प्रोलॉग••••••••••°°°°°°°°°°••••••••••चम चम करती चांदनी और उस चांदनी की सांवली सी रोशनी में यमुना का सांवला सा जल अटखेलियां करता हुआ आगे बढ़ रहा था। वहीं कहीं कोने में कदंब की डाली पर से नीचे लटका हुआ पीताम्बर यमुना के पानी को इतना हौले हौले स्पर्श कर रहा था कि अमृतमय रस प्राप्त हो रहा था, किंतु साथ में तनिक और की चाह, अमृतमय रसपान में व्याधा थी। मद्धम बह रही हवा में मोरपंख झूम रहा था, आनंद ले रहा था। अपने उत्तम भाग्य को सकार रहा था। वो भाग्य जिसे चाहने के लिए बड़े बड़े तपस्वी बरसों