मंजिले - भाग 50

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"समाधी" बैठे कभी धयान लगा है, नहीं न, लगना भी चाहिए, योग तक़ गए हो नहीं ना... जाते कयो नहीं... कोई कोई न कोई अतीत की असली कारगुजरिया की होंगी ---- भूलने देगी कभी न। छोटीया चोरिया करते करते बड़े समगलर बनते है। योग करते करते समाधी तक़ नहीं पहुचे। बहुत हैरत होती होंगी। होंगी जरूर होंगी... बनने की कोशिश नकाम कयो करते हो। जिंदगी असफलता की कुंजी है।हम लोगों ने ही सफलता पर जाना है। भगवान का नाम उचारो... फिर कुछ हो सकता है। "मागने बैठ गए तुम भाई ---" चलो मंदिर से घर तक़ सफर करते है। " ओह