चलो दूर कहीं.. 18 गहराते रात के साथ उस बीहड़ जंगल की भयावहता भी गहराती जा रही थी और प्रतीक्षा को इसकी कुछ सुध न थी । उसके मन मस्तिष्क में उसके अपनों का चित्र तैर रहा था और उनसे मिलने के लिए वो व्याकुल थी । उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करें कैसे अनाह के चंगुल से मुक्त हो? कैसे इस बीहड़ जंगल से बाहर निकले ? उसे तो ये भी पता न था कि वो कहां है..? वह रवि के झोंपड़े के सामने विचारों में डुबी गुमसुम बैठी थी। ठंडी हवा के झोंके से उसका