डिजिटल सन्नाटा: एक अनकही कहानी !!

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शहर की ऊंची इमारतों के बीच, एक छोटे से कमरे में बैठी मैं अक्सर सोचती हूँ कि हम कितना आगे निकल आए हैं। मेरे सामने रखा लैपटॉप और बगल में रखा फोन—ये दोनों मेरी दुनिया के सबसे बड़े दरवाज़े हैं, लेकिन इन्हीं दरवाज़ों ने मुझे मेरी असली दुनिया से दूर कर दिया है।ज़रूरत या दिखावा?.....आजकल की सुबह सूरज की रोशनी से नहीं, बल्कि फोन के 'नोटिफिकेशन' से होती है। हम आँख खोलते ही यह नहीं देखते कि बाहर मौसम कैसा है, बल्कि यह देखते हैं कि दुनिया हमारे बारे में क्या सोच रही है। कल रात जो तस्वीर पोस्ट की