जीवंत देवता अदालत खचाखच भरी थी…पर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था—जैसे दीवारें भी आज कुछ अलग सुनने को तैयार हों।कटघरे में पंडित रामदीन खड़े थे…सूरज की तपिश से झुलसा चेहरा…पर आँखों में एक अद्भुत शांति का प्रकाश।कपाल पर चंदन का तिलक,कंधे पर राम-नाम का गमछा,और पीछे झूलती लंबी चोटी—पर आज उनकी सबसे बड़ी पहचान यह नहीं थी… आज वह केवल एक बेटा बनकर खड़े थे।“आप रामदीन पाठक हैं?”“जी हुजूर…”“क्या करते हैं?”“गाँव के बाहर पुराने मंदिर में रहता हूँ हुजूर…बच्चों को संस्कृत सिखाता हूँ—ताकि वे अपने जड़ों से जुड़े रहें…गीता का अर्थ और उसका जीवन में प्रयोग भी समझाता