रात अब भी गहरी थी…कमरे में हल्की सी रोशनी थी, और बाहर हवा अब शांत हो चुकी थी। सिद्धिका धीरे-धीरे आगे बढ़ी…और बिना कुछ बोले…उसने अपना सिर कृष्णा के सीने पर रख दिया।कुछ पल के लिए सब रुक गया…।फिर सिद्धिका को सुनाई दी कृष्णा के दिल की धड़कन…थक-थक… थक-थक…इतनी सच्ची… इतनी जीवित…ये पहली बार था जब उसने किसी इंसान की धड़कन महसूस की थी।कृष्णा की गर्म साँसें उसके माथे से टकरा रही थीं…और सिद्धिका की अपनी साँसें ठंडी… बहुत ठंडी…जैसे वो किसी और दुनिया से आई हो…सिद्धिका की आँखें बंद हो गई। उसके अंदर एक अजीब सा सन्नाटा फैल गया।