तीन अलग-अलग कमरे – एक ही रात1) करन का कमरा – अंधेरा, सन्नाटा, टूटा हुआ इंसानकमरे में सिर्फ एक टेबल लैंप जल रहा है।करन बिस्तर के कोने पर बैठा है—सीना पकड़े, आँखें लाल, चेहरा थका हुआ।उसके हाथ काँप रहे हैं।करन (अपने आप से, टूटी आवाज़ में) बोला - कबीर… तू संभाल पाएगा ना उसे…?मैं नहीं देख सकता उसे इस हालत में…।वह श्रेया की साड़ी अपने हाथों में भींच लेता है।उसकी आँखों से आँसू गिरते हैं—साड़ी पर छपते हुए।गुस्से में खुद से कहता है—क्यों इतना जुड़ गया मैं… क्यों?सीने का दर्द बढ़ता है।वह दीवार से टिककर बैठ जाता है… आँसू लगातार बह