मुख्य दरवाज़ा खुला था।कॉरिडोर की सफेद लाइट्स झिलमिला रही थीं… और उसी रोशनी में आयुष ने उसे देखा—वो खुद था।उसी की ऊँचाई, वही चेहरा, वही कपड़े… यहाँ तक कि हाथ में वही टूटा हुआ फोन।लेकिन फर्क सिर्फ एक था—उसकी मुस्कान।वो मुस्कान इंसानी नहीं थी… जैसे कोई और उसके चेहरे के अंदर छुपा बैठा हो।आयुष के मुँह से आवाज़ तक नहीं निकली।“ये… ये कैसे…”दरवाज़े के बाहर खड़ा “दूसरा आयुष” धीरे-धीरे अंदर आया। उसके कदमों की आवाज़ नहीं थी, लेकिन फर्श पर पानी के निशान बनते जा रहे थे।पीछे खड़ी नंदिनी ने फुसफुसाया—“यही है…”आयुष ने उसकी तरफ देखा— “कौन है ये?”नंदिनी की