मानवता की जीत (अंतिम संस्करण)धनबाद जिले की छाती पर बसा रहिमनगर…एक छोटा सा कस्बा—जहाँ जिंदगी सरल थी, पर समाज दीवारों में बँटा हुआ।कुएँ अलग थे…रास्ते अलग थे…और दिल—अपने-अपने डर और दायरों में कैद।इसी कस्बे में एक गरीब जुलाहे का परिवार रहता था।परिवार के मुखिया—मौलाना कुतुबुद्दीन।चरखे की घर्र-घर्र आवाज उनके घर की पहचान थी—मानो वह सिर्फ कपड़ा नहीं, जीवन बुन रहे हों।उनकी उँगलियों से निकली खादी इतनी महीन होती किआदिवासी शादियों में दुल्हन के लिए उनके कपड़े दूर जमशेदपुर तक जाते थे।पाँचों वक्त के नमाज़ी…मेहनती, खुद्दार और सच्चे इंसान।घर में दो संतान—बेटा खुर्शीद आलम, जो बनारस की एक बड़ी मस्जिद