चलो दूर कहीं... 14रवि के बेहोश होते ही प्रतीक्षा को लगा जैसे पावर कट हो गया हो.. उसका संपर्क रवि से टूट गया था। उसका हाल जानने के लिए वो व्याकुल थी लेकिन कोई चारा न था। दिन के उजाले में जिस जंगल में सबकुछ जीवंत था.. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सारी सृष्टि चलायमान है.. वही रात के अंधियारे में सुषुप्त और शांत था। न किसी जानवर का शोर, न पक्षियों की चहचहाहट.. गिरते झरने का शोर और पत्तों की फड़फड़ाहट... किसी निशाचर की भांति उस निशब्द सन्नाटे को चीरकर किसी पिशाच के अट्टहास का अहसास करा रहा