पहचान

  • 903
  • 348

New पहचान सांझ ढल चुकी थी। गाँव के कच्चे रास्तों पर धूल बैठने लगी थी और आकाश में लालिमा धीरे-धीरे धुँधली होकर अँधेरे में बदल रही थी। कनछेदी लाल अपने कंधे पर औजारों की पोटली लटकाए, थके कदमों से घर की ओर लौट रहा था। उसके पैरों में जैसे जान ही नहीं बची थी, मगर मन की थकान उससे भी कहीं भारी थी। घर के बाहर नीम के पेड़ के नीचे उसके पिता, घनश्याम, खाट पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। कनछेदी को देखते ही उन्होंने पूछा, “आ गया बेटा? आज कितनी मजूरी मिली?” कनछेदी ने बिना आँख मिलाए जेब