भाग 10: परीक्षा चार, सच्चाई का बोझचौथे दिन की सुबह चंद्रनगर में एक अजीब सी नमी लेकर आई। रात की बारिश के बाद हवा भारी थी, और वर्मा हवेली के बरामदे में बैठे तीनों को एक अजीब सी बेचैनी घेरे हुए थी।"सच्चाई," मृया ने फुसफुसाया, अपने नए सोने की गुलाब को घुमाते हुए जो उसे कल मिला था। "मुझे लगता है मैं सच्चाई से डरती हूँ।"विजय ने अपनी लॉकेट को खोला, जिसमें मृया की तस्वीर थी। "शायद हम सभी डरते हैं। क्योंकि सच्चाई हमेशा वह नहीं होती जो हम चाहते हैं।"आर्यन ने अपनी नई घड़ी देखी, जिसकी सुइयाँ आज विचित्र