पहाड़ पर चढ़ते समय आपका कम से कम श्रम लगना चाहिए. उसे फ़तह करने जैसी कोई इच्छा भी आपके भीतर नहीं होनी चाहिए. आपके अपने स्वभाव की वास्तविकता ने तय करना चाहिए आप किस रफ़्तार से चढ़ेंगे. ऐसा करते हुए अगर आप बेचैन हो जाते हैं तो रफ़्तार बढ़ा दें. हांफने लगें तो धीमे हो जाएं. पहाड़ पर चढ़ना बेचैनी और थकान के बीच संतुलन कायम करना होता है. जब आप बहुत आगे के बारे में न सोच रहे हों, आपका हर कदम न केवल एक गंतव्य हो जाता है, वह अपने आप में एक अद्वितीय घटना भी बनता है. आप