दादी और संदूक

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---दादी और संदूकपहला अध्याय: बचपन की जिज्ञासागाँव के पुराने घर में विजय बचपन से ही उस संदूक को देखता था। लकड़ी का बना, लोहे की पट्टियों से जकड़ा हुआ, और ऊपर से पीतल का ताला लगा हुआ। कमरे के कोने में रखा वह संदूक उसके लिए किसी रहस्य से कम नहीं था।  "दादी, इसमें क्या है?" वह बार-बार पूछता।  दादी मुस्कुराकर कहतीं—"यह संदूक तेरे लिए नहीं है, इसमें बीते ज़माने की कहानियाँ बंद हैं।"  विजय सोचता कि इसमें कोई खज़ाना होगा, या कोई जादुई किताब।  ---दूसरा अध्याय: दादी की यादेंबरसात की एक शाम, जब मिट्टी की महक पूरे घर में फैली थी, दादी ने