अनकहे शब्द

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अनकहे शब्द कस्बे की मुख्य सड़क से थोड़ा हटकर, पीपल के पुराने पेड़ के नीचे डॉ. पुरोहित का छोटा-सा क्लीनिक था। बरामदे में लकड़ी की दो बेंचें रखी थीं और दीवार पर टँगा एक पुराना पंखा चर्र-चर्र की आवाज़ के साथ घूम रहा था। उस दिन दोपहर की हल्की उमस थी। क्लीनिक के भीतर मेज के सामने एक दुबला-पतला बारह वर्षीय लड़का बैठा था—रिंटू। उसके चेहरे पर घबराहट की हल्की परछाईं थी। माथे पर पसीने की महीन बूंदें चमक रही थीं, जबकि कमरे में ठंडक थी। डॉक्टर पुरोहित ने स्टेथोस्कोप हटाकर गहरी सांस ली। “हम्म…” उन्होंने धीरे से कहा और