सफ़र की रंगत - 1

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मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे प्रियांशी, कुछ हुआ तो नहीं मुझे ?"​प्रियांशी बोली, "हाँ, इतना कुछ हो गया और आप पूछ रहे हैं कि क्या हुआ है? चलिए, अब अपनी सीट पर बैठिए।"​मैं अपनी सीट की तरफ बढ़ने लगा।​अंकिता ने पूछा, "भैया, अभी तक कहाँ थे? आपने इतनी देर कर दी!"​मैंने कहा, "कहीं नहीं था, बस एक छोटी बच्ची मिल गई थी। उसी से बातें करते-करते समय का पता ही नहीं चला।"​मैं उस लड़की की बातों में खोया हुआ था। वह नन्ही सी बच्ची थी और उसका कोई नहीं था। (मैंने उदास होकर कहा)​अंकिता बोली, "तो फिर आप उसे अपने