लाइफ ऑफ़ अ वूमेन

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वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी  बचपन से ही मैं कई बार मरी हूं पर अपनी जीने की चाह के चलते हर बार जीवित भी हो जाती। मरने के इतने अनुभवों के बाद भी मुझे मौत से बहुत डर लगता। मैं मरना नहीं चाहती। जितना मैं ज़िंदा रहना चाहती, इतनी ज़्यादा मरती। कई बार मैं भीतर के इंसान के कारण ख़ुद भी मरी।अपने बचपन के दोस्तों के साथ खेलते हुए मैं ईमानदारी बरतती और हर बार कुछ ना कुछ खोती जो मेरे आत्म सम्मान को ख़त्म करता जाता। मम्मी पापा का झगड़ा होता तो सबसे ज़्यादा दु:ख मुझे होता। मुझे ऐसा लगता