नकल से कहीं क्रांति नहीं हुई - 23

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जीतेशकान्त पाण्डेय- आपने ‘पूर्वापर’ पत्रिका का एक मलयालम विषेशांक प्रकाशित किया। इसकी योजना कैसे बनी और इसका उद्देश्य क्या था? डॉ0 सूर्यपाल सिंह- ‘पूर्वापर’ पत्रिका देश के विभिन्न भागों में जाती रही। कभी वित्तीय प्रतिफल की मैंने कामना नहीं की। यह पत्रिका ऑस्ट्रेलिया तक गई और वहाँ के हिंदी अध्यापक की रचना भी छपी। मेरी पत्रिका केरल भी जाती रही। कालीकट विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष इससे जुड़े हुए थे। जब उन्होंने अवकाश प्राप्त किया तो उनके घर का पता न मालूम होने के कारण पत्रिका नहीं भेजी जा सकी। उन्होंने कोरोना के समय एक चिट्ठी भेजकर यह पूछा