अध्याय 20: नियति का वज्रपात और खंडित मर्यादा'ब्रह्म-कक्ष' के वे विशाल और भारी शीशम के द्वार जब अंततः खुले, तो उनकी चरचराहट पूरे प्रांगण में किसी अशुभ संकेत की तरह गूँज उठी। बाहर मैदान में खड़े सैकड़ों छात्र-छात्राओं की सांसें जैसे गले में ही अटक गई थीं। सूर्य अब आकाश के मध्य में था, लेकिन उसकी रोशनी में वह गरमाहट नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी सिहरन थी जो हड्डियों तक पहुँच रही थी।महागुरु बाहर आए, उनके पीछे आचार्या वसुंधरा और अन्य वरिष्ठ आचार्यों की टोली थी। उनके चेहरों पर वह सौम्यता नहीं थी जो सुबह उत्सव के समय दिखी