अध्याय 18: महागुरु का बोध और सुलझता मनमुटावमैदान में बढ़ता कोलाहल और छात्रों के बीच के सुलगते तनाव को भांपते हुए, महागुरु शांत कदमों से सभा के बीच पहुँचे। उनके खड़ाऊँ की आवाज़ जब पत्थरों से टकराई, तो वह गूँज मैदान के शोर पर भारी पड़ने लगी। उनके आते ही वह कोलाहल अचानक एक ऐसे भारी सन्नाटे में बदल गया, जिसमें केवल मशालों के चटकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। आचार्यों के चेहरों पर चिंता की गहरी लकीरें थीं, लेकिन महागुरु की आँखों में वही सदियों पुरानी गहराई और अटूट स्थिरता थी।महागुरु का संबोधनमहागुरु ने अपनी दृष्टि पूरे मैदान