अध्याय 16: महागुरु की घोषणा और मुकाबले का चक्रव्यूह जश्न अपनी चरम सीमा पर था। अलाव की ऊँची उठती लपटें रात के अंधेरे को चीर रही थीं। छात्र-छात्राओं के हँसने-बोलने और संगीत की धुन से पूरा परिसर गूँज रहा था। लेकिन तभी, अचानक हवा का रुख बदला। एक ऐसी रहस्यमयी और भारी शांति छा गई जैसे प्रकृति ने खुद अपनी सांसें रोक ली हों। मशालों की रोशनी अचानक धीमी पड़ी और ऊँचे चबूतरे पर एक दिव्य आभा के साथ महागुरु प्रकट हुए। उनके चेहरे पर समय की गहरी लकीरें और आँखों में एक शांत अधिकार था। उनके ठीक पीछे आचार्या वसुंधरा