स्वाभिमान की रोटीउत्तर प्रदेश के पवित्र शहर वाराणसी की शाम थी। दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती की तैयारियाँ चल रही थीं। घंटियों की आवाज, मंत्रों की गूंज और दीपों की रोशनी से पूरा वातावरण दिव्य लग रहा था। ऐसा लगता था जैसे यहाँ आकर हर दुख बह जाता हो।लेकिन उन्हीं सीढ़ियों पर, थोड़ी दूर, मीरा बैठी थी भूख, थकान और उपेक्षा से टूटी हुई।उसने जमीन पर पड़ा समोसा इसलिए नहीं उठाया क्योंकि उसके भीतर अभी भी स्वाभिमान जिंदा था।और यही बात आदित्य प्रताप सिंह के दिल को छू गई।आदित्य ने धीरे से कहा,“मैं तुम्हें अपने रेस्टोरेंट में काम दूँगा। बदले