RAAKH - खामोश चीखों का शहर

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इस शहर में, सूरज उम्मीद जगाने नहीं उगता था; वह तो बस पिछली रात के ज़ख्म दिखाने उगता था। यह कोई ऐसी जगह नहीं थी जो संविधान या जज के हथौड़े से चलती हो। यहाँ, सिर्फ़ एक आदमी का कानून था—एक ऐसा आदमी जिसका नाम डर की दुआओं में फुसफुसाया जाता था।हवा भारी थी, बिना सज़ा वाले गुनाहों की गंध से भरी हुई। हर गली, हर टिमटिमाता दीया, और हर कांपती रूह उसी की थी। उसका शब्द सिर्फ़ एक हुक्म नहीं था; यह किस्मत थी। अगर वह बोलता, तो शहर हिल जाता; अगर वह चुप हो जाता, तो दुनिया की