“आंखें बंद थीं तो सब दिखता था, आंखें खुलीं नहीं कि सब ओझल हो गया।”एक छोटी-सी बच्ची के मुख से निकला यह वाक्य साधारण प्रतीत हो सकता है, परंतु जब इसे मन में उतारकर देखा जाए तो यह जीवन-दर्शन का गूढ़ सूत्र बन जाता है। अक्सर सत्य जटिल शब्दों में नहीं, सरल अनुभूतियों में प्रकट होता है। बालमन का सहज कथन कभी-कभी उन प्रश्नों को जन्म देता है, जिनका उत्तर बड़े-बड़े ग्रंथ भी नहीं दे पाते।आंखें बंद करना सामान्यतः अंधकार का प्रतीक माना जाता है। परंतु क्या वास्तव में आंखें बंद करना अंधकार में जाना है? या फिर वह बाहरी