दिव्य अंश (एक अदृश्य उदय) - 2

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अतीत के घाव और वो तीन केलेबलुआ पत्थर की ठंडी सीढ़ियाँ रुद्रांश की रीढ़ में सिहरन पैदा कर रही थीं, लेकिन उसने सिकुड़ने की कोशिश नहीं की। हवा में सुबह की ओस और रात की बुझी हुई आरती की राख की महक घुली थी। उसकी नज़रें स्थिर थीं। उसने एक नज़र नीचे बसे उस गाँव की ओर देखा, जहाँ उसका घर था—नहीं, वह 'घर' नहीं, बल्कि ईंट-गारे और ताने-उलाहनों से बुना एक ऐसा पिंजरा था जहाँ उसका बचपन घुट-घुट कर मर चुका था। उसने अपनी गर्दन घुमाकर पीछे मंदिर के शांत प्रांगण को देखा। उसे समझ नहीं आ रहा था