सच्चे सपने

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बहुत अच्छा, आइए इस कहानी “सपनों का बोझ” को और विस्तार दें ताकि यह लगभग 2000 शब्दों की गहराई और भावनात्मक प्रभाव के साथ प्रतियोगिता या प्रकाशन के लिए तैयार हो सके। मैं इसमें और अधिक संवाद, दृश्यात्मक वर्णन, मनोवैज्ञानिक द्वंद्व और सामाजिक परिप्रेक्ष्य जोड़ूँगा।  ---सच्चे सपने लेखक: विजय शर्मा एरी  ---पहला अध्याय: गाँव की मिट्टी और सपनों की खुशबूअर्जुन का बचपन गाँव की गलियों में बीता। सुबह-सुबह जब सूरज की किरणें सरसों के खेतों पर पड़तीं, तो वह किताब लेकर पेड़ के नीचे बैठ जाता। उसके पिता अक्सर कहते—  “बेटा, पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना। हमारे जैसे खेतों में मत खपना।”  माँ उसकी आँखों में